भारत देश अपनी पुरानी संस्कृति के लिए दुनिया में प्रसिद्ध है। जैन धर्म भी पुराना है। आप पुछोगे कितना पुराना? इसका जवाब है इस दुनिया के जितना पुराना।
शायद यह बात आपके समझ में न आयेगी। पर यह वास्तविकता है कि जैन धर्म दुनिया के जितना ही पुराना है। यह बात कितने ही अजैन विद्वानों ने स्वीकार ली है। विज्ञान इतना आगे बढ़ा है फिर भी ज्ञान का विकास बहुत कम परिमाण में हुआ है/
जैन धर्म की आदि जानना असंभव है। “जबसे इस विश्व का प्रारंभ है तब से जैन धर्म विद्यमान है। मैं तो मानता हूँ कि जैन धर्म वैदिक धर्म से भी प्राचीन है।”
दुनिया के जितना ही यह प्राचीन है। जैन धर्म के प्रथम स्थापक की कल्पना भी मुश्किल है। भगवान महावीर भी जैन धर्म के प्रथम स्थापना न थे। वे तो मात्र जैन धर्म के इस अवसर्पिणी के सबसे अंतिम याने 24 वे तीर्थकर थे।
भगवान महावीर ने यह कभी नहीं कहा था कि में इस नये धर्म की प्रस्थापना करता हूँ। उनके उपदेश में उन्होंने साफ तौर पर कह दिया है
कि मैं तो वग तत्व कह रहा हूँ, जो प्राचीन काल में अनंत तीर्थकरों के द्वारा कहा हुआ है, उसी को दुहराता हूँ।
भगवान महावीर द्वारा जैन धर्म का पुनः प्रकाश किया गया था। उनके पूर्व भी 23 तीर्थंकर हो गये जिन्होंने भी जैन धर्म का प्रचार किया था।
इससे जैन धर्म की प्राचीनताप्रमाणित होती है।
इस प्रकार जैन धर्म ग्रंथों की दृष्टि से जैन धर्म का सबसे प्रथम स्थापक कोई भी नहीं है।
आप पूछोगे कि ‘ऋषभदेव तो पहले तीर्थंकर है न ?’ नहीं, इस अवसर्पिणी काल की दृष्टि से वे पहले तीर्थंकर है अनंतकाल की अपेक्षा से नहीं। कारण ?
उन्होंने भी यही कहा कि “अनंत तीर्थंकरों ने जो कुछ कहा है वही मैं कहता हूँ। कुछ भी नया नहीं कहता।”
इस प्रकार जैन धर्म का कोई भी तीर्थंकर यह नहीं कहता कि मैंने नया धर्म बताया है।
अन्य सब धर्मों के संस्थापकों के नाम हमें मिलते हैं। इन संस्थापकों ने सबसे पहले उनके धर्मग्रंथो की रचना की जिससे जगत का सबसे प्राचीन
धर्म जैनधर्म है यह स्वाभाविकता से ही सिद्ध हो जाता है। किन्तु, यदि कोई प्रतिवाद करे कि यह तो सब प्राक् ऐतिहासिक काल की बात है इसिलिए यह विश्वास के योग्य नहीं है। भले ही तीर्थंकरों ने कहा है कि
हम जैनधर्म के प्रथम स्थापक नहीं है। पर हमें तो जैनधर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है इसके लिए ऐतिहासिक प्रमाण की आवश्यकता है।
आज उपलब्ध ग्रंथों में प्राचीन से प्राचीन ग्रंथ हिंदू वेद माने जाते हैं। सब विद्वान वेदों को कम पांच हजार वर्ष पूर्व के मानते हैं।
अब आप कहेंगे कि फिर तो हिंदुधर्म ही प्राचीन कहलायेगा। क्योंकि उनके ग्रंथ जैनधर्म के ग्रंथों से भी प्राचीन है। लेकिन, भाई ! उन वेदों कसे ही जैनधर्म प्राचीन प्रमाणित होता है। कैसे ? वेदों में भगवान ऋषभदेव भगवान अरिष्टनेमि आदि के नाम आते है। केवल नाम ही नहीं उनके मंत्र भी हैं। इससे स्वयं प्रमाणित हो जाता है
कि वेद लिखे गये उससे पहले जैनधर्म का अस्तित्व था। जैनधर्म के तीर्थंकरों की बात तो उस समय भी मसहूर थी। वेदों में आनेवाले ये नाम
आरण्यक श्रीमद् भागवत और पुराणों से भी समर्थित है उसमें जैनधर्म के चौबीस तीर्थंकरों की बात है। भगवान ऋषभदेव का चरित्र भी वहाँ
मिलता है। शत्रुंजय गिरनार आदि जैनों के परम पवित्र स्थानों का भी वहाँ उल्लेख है। वेदों में प्राप्त मंत्रों से जैनधर्म की प्राचिनता सिद्ध होती हैं।