Don’t walk on the grass – green lawn

Don’t walk on the grass – green lawn

Don’t walk on the grass – green lawn

Don’t walk on the grass
According to the scriptures if we have a tree or a leaf of a plant a flower or leaf, even break them angry so that if they are at that time man, how many times I die-Cast-raised and slaughtered But they only become weak and sad only sad experience of live.
When we are walking on the grass, then how many species of grass crushed die or become adhamarē taṛapha several days. The time the grass from the shelter to many living two and even three indriya soul crush Could die or become adhamarē taṛapha several days. Your grass like this every day on travel-millions millions living gives trāsa
Walk on the grass like a pregnant woman’s stomach is like walking on them. So much pain the jīvō inert.
Your such a task in front of you that are going to be possible in one of three indriya. Today what you grass thatch in living organisms, they are also like us in the east. But they become very pramādī that crushed grass time Today was so they could get in the mud so terrible sad bear. The world fears the tirthankara, even now you are not of this world yet?
Hey puṇyātmā, only accepting from you bad so enormously the bond, that no one can’t imagine.

घास पर मत चलो

शास्त्रों के अनुसार हम अगर एक पेड़ की पत्ती या किसी पौधे का एक फूल या पत्ती भी तोड़ते हैं, तो उनको इतना क्रोध आता है कि अगर वे उस समय मनुष्य होते, तो हमे कितनी ही बार उठा-उठा कर फेंक-फेंक कर मार डालते । लेकिन वे तो बस बेबस होकर सिर्फ दुःख और दुःख का ही अनुभव करते रहते हैं ।

जब हम घास पर चलते हैं, तो उस समय कितने ही घास के जीव कुचल कर मर जाते हैं या अधमरे होकर कई दिन तक तड़फ रहे होते हैं । साथ ही उस समय घास के आश्रय से रह रहे कितने ही दो और तीन इन्द्रिय जीव भी कुचल कर मर जाते हैं या अधमरे होकर कई दिन तक तड़फ रहे होते हैं । आपका इस तरह घास पर घूमना हर रोज लाखो-करोड़ो जीवों को त्रास देता है ।

घास पर चलना जेसे गर्भवती महिला के पेट पर चलने जैसा है इतनी वेदना उन जीवो को होती हैl

आपका इस तरह का कार्य आपके आगे होने वाले असंख्य भव एक से तीन इन्द्रिय के करता है । आज जो आपको घास-फूस में जीव रह रहे हैं, वे भी पूर्व में हमारे जैसे ही थे । लेकिन उन्होंने अत्यंत प्रमादी होकर उस समय घास को कुचला था, इसलिए आज वे मिट्टी में मिल कर इतना भयानक दुःख उठा रहे हैं । जिस संसार से तीर्थंकर भी डरे, क्या अब आपको भी इस संसार से नहीं डरना चाहिये ?

हे पुण्यात्मा, इस बात को सिर्फ स्वीकार करने से ही आपको इतना अतिशय पुण्य का बंध होता है, कि जिसकी कोई भी कल्पना नहीं कर सकता है

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