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11. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

11. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

बंधवा सुहिणो सव्वे , पियमायापुत्तभारिया । पेयवणाउ नियत्तंति , दाऊणं सलिलंजलिं ॥११ ॥ : अर्थ : सभी बान्धव , मित्र , पिता , माता , पुत्र , पत्नी आदि मृतक के प्रति जलांजलि देकर श्मसानभूमि से वापस अपने घर लौट आते हैं ।।11 ।।

10. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

10. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

कालंमि अणाईए , जीवाणं विविहकम्मवसगाणं । तं नत्थि संविहाणं , संसारे जं न संभवइ ॥१० ॥ : अर्थ : अनादिकालीन इस संसार में नाना कर्मों के आधीन जीवात्मा को ऐसा कोई पर्याय नहीं है , जो संभवित न हो ।।10।।

9. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

9. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

छायामिसेण कालो , सयलजियाणं छलं गवेसंतो । पासं कह वि न मुंचइ , ता धम्मे उज्जमं कुणह ॥९ ॥ : अर्थ : हे भव्य प्राणियो ! छाया के बहाने सकल जीवों के छिद्रों का अन्वेषण करता हुआ यह काल ( मृत्यु ) हमारे सामीप्य को नहीं छोड़ता है , अतः…

8. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

8. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

दीहरफणिंदनाले , महियरकेसर दिसामहदलिल्ले । उअ – पियइ कालभमरो , जणमयरंदं पुहविपउमे ॥८ ॥ : अर्थ : खेद है कि दीर्घ फणिधर रुपी नाल पर पृथ्वी रुपी कमल है , पर्वत रुपी केसराए और दिशा रूपी बड़े – बड़े पत्र हैं , उस कमल पर बैठकर कालरुपी भ्रमर सतत जीव रुपी…

7. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

7. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

सा नत्थि कला तं नत्थि , ओसहं तं नत्थि किं पि विन्नाणं । जेण घरिज्जइ काया , खज्जंती कालसप्पेण ॥७ ॥ : अर्थ : ऐसी कोई कला नहीं है , ऐसी कोई औषधि नहीं है , ऐसा कोई विज्ञान नहीं है , जिसके द्वारा काल रुपी सर्प के द्वारा खाई…

6. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

6. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

दिवस – निसा – घडिमालं , आउं सलिलं जियाण घेत्तूणं । चंदाइच्चबइल्ला , कालऽरहट्टं भमाडंति ॥६ ॥ : अर्थ : चन्द्र और सूर्य रुपी बैलों से जीवों के आयुष्य रुपी जल को दिन और रात रुपी घट में ग्रहण कर काल रुपी अरहट जीव को घुमाता है ॥6 ॥

5. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

5. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

मा सुअह जग्गियव्वे , पलाइयव्वंमि कीस वीसमेह ? | तिणि जणा अणुलग्गा , रोगो अ जरा अ मच्चू अ ॥५ ॥ : अर्थ : जाग्रत रहने योग्य धर्म – कर्म के विषय में सोओ मत । नष्ट होने वाले इस संसार में किसका विश्वास करोगे ? रोग , जरा और…

4. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

4. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

ही संसार – सहावं , चरियं नेहाणुरागरत्ता वि । जे पुव्वण्हे दिट्ठा , ते अवरण्हे न दीसंति ॥४ ॥ : अर्थ : अहो ! संसार का स्वभाव कैसा है ? जो पूर्वाह में स्नेह के अनुराग से रक्त दिखाई देते हैं . वे अपराह्न में वैसे दिखाई नहीं देते हैं…

3. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

3. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

जं कल्ले कायव्वं , तं अज्जं चिय करेह तुरमाणा । बहुविग्घो हु मुहुत्तो , मा अवरण्हं पडिक्खेह ॥३ ॥ : अथॅ : जो धर्मकार्य कल करने योग्य है , उसे आज ही शीघ्र कर लो । मुहुर्त ( काल ) अनेक विघ्नों से भरा हुआ है , अतः अपराह्र पर…

2. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

2. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

अज्जं कल्लं परं परारिं, पुरिसा चिंतंति अत्थसंपत्तिं । अंजलिगयं व तोयं , गलंतमाउं न पिच्छंति ॥२ ॥ : अर्थ : आज मिलेगा … कल मिलेगा … परसों मिलेगा । इस प्रकार अर्थ / धन की प्राप्ति की आशा में रहा मनुष्य अंजलि में रहे हुए जल की भाँति क्षीण होते…

1. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

1. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

संसारम्मि असारे , नत्थि सुहं वाहि – वेअणा – पउरे । जाणंतो इह जीवो , न कुणइ जिणदेसियं धम्मं ॥१ ॥ अथॅ – व्याधि – वेदना से प्रचुर इस असार संसार में लेश भी सुख नहीं है….. यह जानते हुए भी जीवात्मा जिनेश्वर भगवन्त द्वारा निर्दिष्ट धर्म का आचरण नहीं…

Vardhaman Shakrastav Stotra | श्री वर्धमान-शक्रस्तव

Vardhaman Shakrastav Stotra | श्री वर्धमान-शक्रस्तव

पूज्य आचार्य श्री विजय सिद्धसेन-दिवाकर सूरि विरचित श्री वर्धमान-शक्रस्तव (Vardhaman Shakrastav) कृतज्ञताके छे वाक्यो जयतु जयतु नित्यं श्री वीतराग ।। जयतु जयतु नित्यं श्री वर्धमान शक्रस्तव।। जयतु जयतु नित्यं श्री शकेन्द्र महाराजा।। जयतु जयतु नित्यं श्री सिद्धसेन दिवाकर सूरी।। जयतु जयतु नित्यं श्री श्रुतवाणी॥ ॐ नमोऽर्हते १ भगवते, २ परमात्मने,…

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