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104. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

104. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

किंबहुणा जिणधम्मे , जइयव्वं जह भवोदहिं घोरं । लहु तरिउमणंतसुहं , लहइ जिओ सासयं ठाणं ॥१०४ ॥ : अर्थ : ज्यादा कहने से क्या फायदा ! भयङ्कर ऐसे भवोदधि को सरलता से पारकर अनन्त सुख का शाश्वत स्थान जिस प्रकार से प्राप्त हो , उस प्रकार से जिनधर्म में यत्न…

103. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

103. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

विसमे भवमरुदेसे , अणंतदुहगिम्ह तावसंतत्ते । जिणधम्मकप्परुक्खं , सरसु तुमं जीव सिवसुहदं ॥१०३ ॥ : अर्थ : हे जीव ! अनन्त दुःख रुप ग्रीष्म ऋतु के ताप से सन्तप्त और विषम ऐसे संसाररुप मरुदेश में शिवसुख को देनेवाले जिनधर्म रुपी कल्पवृक्ष को तू याद कर ॥103 ॥

102. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

102. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

चउगइऽणंतदुहानल – पलित्त भवकाणणे महाभीमे । सेवसु रे जीव ! तुम , जिणवयणं अमियकुंडसमं ॥१०२ ॥ : अर्थ : हे जीव । चारगतिरूप अनन्त दुःख की अग्नि जलते हुए महाभयकर भववन में अमृतकुण्ड के समान जिनवाणी का तू सेवन कर ।। 102 ।।

101. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

101. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

धम्मो बंधु सुमित्तो य , धम्मो य परमो गुरु । मुक्खमग्ग पयट्टाणं , धम्मो परमसंदणी ॥१०१ ॥ : अर्थ : धर्म बन्धु और अच्छा मित्र है । धर्म परमगुरु है । मोक्षमार्ग में प्रवृत्त व्यक्ति के लिए धर्म श्रेष्ठ रथ है ।।101 ॥

100. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

100. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

जिणधम्मोऽयं जीवाणं , अपुव्वो कप्पपायवो । सग्गापवग्गसुक्खाणं , फलाणं दायगो इमो ॥१०० ॥ : अर्थ : यह जिनधर्म जीवों के लिए अपूर्व कल्पवृक्ष है । यह धर्म स्वर्ग और मोक्ष के सुखों का फल देने वाला है || 100 ||

99. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

99. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

धी धी ताण नराणं , विन्नाणे तह गुणेसु कुसलत्तं । सुह सच्च धम्म रयणे , सुपरिक्खं जे न जाणंति ॥९ ९ ॥ : अर्थ : जो सुखदायी और सत्यधर्मरुप रत्न की अच्छी तरह से परीक्षा नहीं कर सकते हैं , उन पुरुषों के विज्ञान और गुणों की कुशलता को धिक्कार…

98. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

98. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

मिच्छे अणंतदोसा , पयडा दीसंति न वि य गुणलेसो । तह वि य तं चेव जिया , ही मोहंधा निसेवंति ॥९८ ॥ : अर्थ : मिथ्यात्व में प्रगट अनंत दोष दिखाई देते हैं और उसमें गुण का लेश भी नहीं है , फिर भी आश्चर्य है कि मोह से अन्धे…

97. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

97. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

पच्चक्खमणंत गुणे , जिणिंदधम्मे न दोसलेसोऽवि । तहविहु अन्नाणंधा , न रमंति कयावि तम्मि जिया ॥ ९७ ॥ : अर्थ : जिनेश्वर के धर्म में प्रत्यक्ष अनंत गुण हैं और दोष नाम मात्र भी नहीं है , फिर भी खेद की बात है कि अज्ञान से अन्ध बने हुए जीव…

96. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

96. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

जह दिट्ठीसंजोगो , न होइ जच्चंधयाण जीवाणं । तह जिणमयसंजोगो , न होइ मिच्छंधजीवाणं ॥९६ ॥ : अर्थ : : अर्थ : जन्म से अन्धे जीव को जिस प्रकार दृष्टि का संयोग नहीं होता है , उसी प्रकार मिथ्यात्व से अन्धे बने हुए जीव को भी जिनमत का संयोग नहीं…

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