चार मंगल
भगवान महावीर कहते है की शाश्वत मंगल चार है।Four Mars

पहला मंगल है :- अरिहंत मंगल ।
अरिहंत को मंगल क्यों कहा गया ? अरिहंत को इसलिए मंगल कहा गया कि वे अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर है । उन्होंने अपने भीतर की जो अमंगल की जड़ है उसे मूल से उखड कर फेंका है। अमंगल की जड़ है राग और द्वेष । उन्होंने
राग – द्वेष को पूरी तरह खत्म कर दिया इसलिए उन्हें मंगल कहा गया । अरिहंत मंगल है क्योंकि वे मार्गदर्शक होते है । वे हमे मार्ग दिखाते है ।
दूसरा मंगल है :- सिद्ध मंगल ।
सिद्ध पूर्ण आत्मस्वरूप को उपलब्ध आत्मा है इसलिए उन्हें भी मंगल कहा गया । वे पूर्णत्व को उपलब्ध हो गए , सिद्ध हो गए । जन्म – मरण से मुक्त हो चुके , बुद्ध हो गए इसलिए वे मंगल स्वरुप बन गए । वे अपने लक्ष्य तक पहुँच चुके है । उन्होंने मंज़िल को प्राप्त किया है, मुक्ति को प्राप्त किया है । हमारा भी लक्ष्य वही है इसलिए सिद्ध भी मंगल है ।
तीसरा मंगल है :- साहू मंगल ।
अर्थात साधू मंगल है ।
जो साधना के पथ पर चल रहे है । यह साधना उन्हें मंगल बना देती है । साधू याने पञ्च परमेष्ठी का पांचवा पद । इसे मंगल कहने की वजह समझ लीजिए । वैसे तो यह अंतिम पद है पर एक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पहला पद है क्योंकि पहले चार पदों को साधू का पद लेना ही पड़ता है , तब ही वे आगे जा सकते है । उसके सिवा अरिहंत, सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय बन ही नहीं सकते ।
इसलिए और एक महत्वपूर्ण बात कही है कि पञ्च परमेष्ठी में भी दो ही पद मुख्य है : १. साधू, २. सिद्ध
साधू यह साधना का पहला कदम है और सिद्ध यह साधना का अंतिम कदम है । साधू ही सिद्ध बनता है इसलिए कहा है ” साहू मंगलम ” ।
चौथा मंगल है :- केवली प्ररूपित धर्म मंगल ।
केवली अर्थात सबकुछ जानने, देखने, समझनेवाले महापुरुष और उन्होंने जिस धर्म की प्ररूपणा की है वह धर्म भी मंगल है । जो केवली है, जिन्हें केवलज्ञान हुआ है उन्होंने जो धर्म कहा है वह धर्म मंगल है ।
यहाँ समझने जैसी बात यह है कि धर्म को मंगल कहा है, शास्त्रों को नहीं । यदि शास्त्र को मंगल मानते तो बहुत समस्या निर्माण हो जायेगी । क्योंकि हर पंथ के शास्त्र- आगम अलग अलग है। स्थानकवासी ३२ आगम मानते है, मंदिर मार्गी ४५ मानते है, दिगंबर के आगम तो खूब ही अलग है। ऐसे में यदि शास्त्र को मंगल माने तो झगड़ा शुरू हो जायेगा ।
इसीलिए धर्म को मंगल कहा गया है ।

