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95. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

95. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

जह चिंतामणिरयणं , सुलहं न होइ तुच्छ विहवाणं । गुण विहव वज्जियाणं , जियाण तह धम्मरयणं पि ॥१५ ॥ : अर्थ : जिस प्रकार तुच्छ वैभववाले गरीब को चिन्तामणि रत्न सुलभ नहीं होता है , उसी प्रकार गुणवैभव से दरिद्र व्यक्ति को भी धर्मरूपी रत्न की प्राप्ति नहीं होती है…

94. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

94. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

अथिरेण थिरो समलेण निम्मलो परवसेण साहीणो । देहेण जइ विढप्पइ धम्मो ता किं न पज्जत्तं ॥९४ ॥ : अर्थ : अस्थिर , मलिन और पराधीन देह से स्थिर , निर्मल और स्वाधीन धर्म की प्राप्ति हो सकती हो तो तुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ ? || 94 ॥

93. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

93. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

दुलहो पुण जिणधम्मो , तुमं पमायायरो सुहेसी य । दुसहं च नरयदुक्खं , कह होहिसि तं न याणामो ॥९३ ॥ : अर्थ : जिनधर्म की प्राप्ति दुर्लभ है । तू प्रमाद में आदरवाला और सुख का अभिलाषी है । नरक का दुःख असह्य है । तेरा क्या होगा , यह…

92. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

92. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

बुज्झसु रे जीव ! तुमं , मा मुज्झसु जिणमयंमि नाऊणं । जम्हा पुणरवि एसा , सामग्गी दुल्लहा जीव ! ॥९२ ॥ : अर्थ : हे जीव ! तू बोध पा ! जिनमत को जानकर तू व्यर्थ ही मोहित न हो ! क्योंकि इस प्रकार की सामग्री की पुनः प्राप्ति होता…

91. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

91. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

रे जीव ! बुज्झ मा मुज्झ , मा पमायं करेसि रे पाव !। किं परलोए गुरु दुक्ख भायणं होहिसि अयाण ? ॥९ १ || : अर्थ : हे जीव ! तू बोध पा ! मोहित न बन । हे पापी ! तू प्रमाद मत कर । हे अज्ञानी ! परलोक…

90. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

90. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

कीलसि कियंत वेलं , सरीर वावीइ जत्थ पइ समयं । कालरहट्टघडीहिं , सोसिज्जइ जीवियंभीहं ॥१० ॥ : अर्थ : इस देशरूपी बावड़ी में तू कितने समय तक क्रीड़ा करेगा ? जहाँ से प्रति समय कालरुपी अरहट के घड़ों द्वारा जीवनरूपी पानी के प्रवाह का शोषण हो रहा है ।।90 ॥

89. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

89. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

तहवि खणं पि कया वि हु अन्नाण भुअंगडंकिआ जीवा । संसारचारगाओ न य उव्वज्जंति मूढमणा ॥८ ९॥ : अर्थ : अज्ञानरुपी सर्प से डसे हुए मूढ मनवाले जीव इस संसाररुपी कैद से कभी भी उद्वेग प्राप्त नहीं करते हैं ।।89।।

88. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

88. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

विधिज्जंता असयं जम्म – जरा – मरण – तिक्खकुंतेहिं । दुहमणुहवंति घोरं , संसारे संसरंत जिया ॥८८ ॥ : अर्थ : इस संसार में भटकनेवाले जीव जन्म , जरा और मृत्युरुपी तीक्ष्ण भालों से बिंधाते हुए भयङ्कर दुःखों का अनुभव करते हैं ।। 88 ॥

87. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

87. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

पवणुव्व गयण मग्गे , अलक्खिओ भमइ भववणे जीवो । ठाणट्ठाणंमि समु – ज्झिऊण धण सयणसंघाए ॥८७ ॥ : अर्थ : स्थान – स्थान में धन तथा स्वजन के समूह को छोड़कर भव वन में अपरिचित बना हुआ यह जीव आकाश मार्ग में पवन की तरह अदृश्य रहकर भटकता रहता है…

86. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

86. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

पिय माय सयण रहिओ , दुरंत वाहिहिं पीडिओ बहुसो । मणुयभवे निस्सारे , विलविओ किं न तं सरसि ॥८६ || : अर्थ : साररहित ऐसे मानवभव में माता – पिता तथा स्वजनरहित भयङ्कर व्याधि से अनेक बार पीड़ित हुआ तू विलाप करता था , उसे तू क्यों याद नहीं करता…

85. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

85. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

सत्तसु नरयमहीसु वज्जानलदाह सीअविअणासु । वसिओ अणंतखुत्तो विलवंतो करुणसद्देहिं ॥८५ || : अर्थ : जहाँ वज्र की आग के समान दाह की पीड़ा है और भयङ्कर असह्य शीतवेदना है ऐसी सातों नरक पृथवियों में भी करुण शब्दों से विलाप करता हुआ अनन्त बार रहा है ।।85 ॥

84. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

84. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

दुट्टट्ठकम्मपलया- निलपेरिउ भीसणंमि भवरण्णे । हिंडंतो नरएसु वि , अणंतसो जीव ! पत्तोसि ॥८४ ॥ : अर्थ : हे जीव ! दुष्ट ऐसे आठ कर्मरुपी प्रलय के पवन से प्रेरित होकर इस भयड्कर जगल में भटकता हुआ तू अनन्त बार नरकगति में भी गया है ।।84।।

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