Samyag Tap Ke 12 Gun | Navpad Aaradhna

Samyag Tap Ke 12 Gun | Navpad Aaradhna

Samyag Tap Ke 12 Gun | Navpad Aaradhna

Samyag Tap Ke 12 Gun | Navpad Aaradhna

सम्यग् तप पद के १२ गुणों

                    तप जीवन का अमृत है। जैसे अमृत मिलने पर मृत्यु का डर समाप्त हो जाता है वैसे ही हमारे जीवन में तप रूपी अमृत आने पर जीवन अमर हो जाता है। दूध को तपाने से मलाई, अन्न को तपाने से स्वादिष्ट भोजन, सोने को तपाने से आभूषण बन जाता है। वैसे ही शरीर को तप की अग्नि द्वारा तपाने से हमारे कर्म रूपी मैलखरने लगता है।

                   परमात्मा महावीर जानते थे कि उन्हें उसी भव में मोक्ष जाना है। फिर भी घाती कर्मों का क्षय करने के लिए दीक्षा लेकर एकमात्र तप धर्म का ही सहारा लिया। साढ़े बारह वर्ष तक भूमि पर बैठे नहीं। सोये नहीं तप की साधना तभी फलीभूत हुयी और सभी घाती कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान को प्राप्त किया।

तप

चारित्र को चमकाने वाला है।

कर्म निर्जरा कराने वाला है।

                               जीव मात्र तप की आराधना कर सके इसलिए ऐसा तप 12 प्रकार का बताया गया है। जिसमें ब्राह्म तप 6 प्रकार से है। और अभ्यंतर तप 6 प्रकार से है। बाह्य द्रव्य के आलम्बन से होता है और दूसरों के देखने में आता है, इसलिए इनको बाह्य तप कहते हैं।

                               आभ्यंतर तप (अंतरङ्ग तप) प्रायश्चित्तादि तपों में बाह्य द्रव्य की अपेक्षा नहीं रहती है। अंतरंग परिणामों की मुख्यता रहती है तथा इनका स्वयं ही संवेदन होता है। ये देखने में नहीं आते इसलिए प्रायश्चित्तादि को अंतरङ्ग तप माना है।

बाह्य तप के छह प्रकार

1 अनशनचारों प्रकार के आहार का त्याग यह एक दिन को आदि लेकर बहुत दिन तक के लिए किया जाता है। इन्द्रिय संयम की सिद्धि के लिए एवं कर्मों की निर्जरा के लिए अनशन तप किया जाता है।

2 उणोदरीभूख से कम खाना उणोदरी नामक तप है। उणोदरी तप संयम को जागृत रखने, दोषों को प्रशम करने, संतोष और स्वाध्याय आदि की सुख पूर्वक सिद्धि के लिए किया जाता है।

3 वृत्तिसंक्षेपवृतिसंक्षेप तप आशा की निवृत्ति के लिए, अपने पुण्य की परीक्षा के लिए एवं कर्मों की निर्जरा के लिए किया जाता है।

4 रसत्यागधी, दूध, दही, शकर, नमक, तेल, इन छ: रसों में से एक या सभी रसों का त्याग करना रसत्याग तप है।

.5 कायक्लेशशरीर को सुख मिले ऐसी भावना को त्यागना कायक्लेश तप है।

6 संलीनताशरीर के अंगोपांग के प्रति ममत्व का त्याग करना वह संलीनता तप है।

अभ्यंतर तप के छह प्रकार

1 प्रायश्चित्त प्रमादजन्य दोष का परिहार करना प्रायश्चित तप है। व्रतों में लगे हुए दोषों को प्राप्त हुआ साधक, जिससे पूर्व किए अपराधों से निर्दोष हो जाय वह प्रायश्चित तप है।

2 विनयमोक्ष के साधन भूत सम्यग्ज्ञानादिक में तथा उनके साधक गुरुआदि में अपनी योग्य रीति से सत्कार आदि करना विनय तप है।

3 वैयावृत्य अपने शरीर व अन्य प्रासुक वस्तुओं से मुनियों व त्यागियों की सेवा करना, उनके ऊपर आई हुई आपत्ति को दूर करना, वैयावृत्य तप है। 

4 स्वाध्यायज्ञानभावनालस्यत्यागः स्वाध्यायः” आलस्य त्यागकर ज्ञान की आराधना करना, स्वाध्याय तप है । अथवा २. अङ्ग और अङ्गबाह्य आगम की वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मकथा करना, स्वाध्याय तप है।

5 ध्यानउत्तम संहनन वाले का एक विषय में चित्तवृत्ति का रोकना ध्यान है, जो अन्तर्मुहूर्त तक होता है।

6 व्युत्सर्ग। अहंकार ममकार रूप संकल्प का त्याग करना ही, व्युत्सर्ग तप है। जैन शासन में नवपद का अनूठा स्थान है। बाकी बहुत सारे पर्व वर्ष में केवल एक बार आते है जबकि यह ओलीजी पर्व वर्ष में दो बार आता है। संसार से बाहर निकलना हो तो नवपद की साधना से निकला जा सकता है। इस नवपद में साध्य (देव तत्त्व), साधक (गूरू तत्त्व) और साधन (धर्म तत्त्व) की सुन्दर रचना है।

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