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83. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

83. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

एवं तिरियभवेसु , कीसंतो दुक्खसयसहस्सेहिं । वसिओ अणंतखुत्तो , जीवो भीसणभवारण्णे ॥८३ ॥ : अर्थ : इस प्रकार इस संसार रूपी जङ्गल में हजारों लाखों प्रकार के दुःखों से पीड़ित होकर तियॅच के भव में अनन्त बार रहा है ।। 83 ।।

82. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

82. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

वासासु रणमज्झे , गिरिनिज्झरणोदगेहि वुज्झंतो । सीआनिलडज्झविओ , मओसि तिरियत्तणे बहुसो ॥८२ ॥ : अर्थ : तिर्यंच के भव में जङ्गल में वर्षा ऋतु में झरने के जल के प्रवाह में बहते हुए तथा ठण्डे पवन से संतप्त होकर अनेक बार बेमौत मरा है ।। 82 ।।

81. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

81. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

गिम्हायवसंतत्तो , रण्णे छुहिओ पिवासिओ बहुसो । संपत्ती तिरियभवे , मरणदुई बहू विसूरंतो ॥८१ || : अर्थ : इस आत्मा ने तिर्यंच के भव में भयङ्कर जङ्गल में ग्रीष्म ऋतु के ताप से अत्यन्त ही संतप्त होकर अनेक बार भूख और प्यास की वेदना से दुःखी होकर मरण के दुःख…

80. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

80. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

सिसिरंमि सीयलानिल- लहरिसहस्सेहिं भिन्न घणदेहो । तिरियत्तणंमि रण्णे , अणंतसो निहण मणुपत्तो ॥८० ॥ : अर्थ : हे आत्मन् ! तिर्यंच के भव में ठण्डी ऋतु में ठण्डी लहरियों से तेरा पुष्ट देह भेदा गया और तू अनन्ती बार मरा है ।। 80 ॥

79. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

79. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

नियकम्म पवण चलिओ जीवो संसार काणणे घोरे । का का विडंबणाओ , न पावए दुसह दुक्खाओ ॥७ ९ ॥ : अर्थ : अपने कर्मरुपी पवन से चलित बना हुआ यह जीव इस संसाररुपी घोर जंगल में असह्य वेदनाओं से युक्त कौन कौनसी विडंबनाओं को प्राप्त नहीं करता है ।। 79…

78. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

78. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

संसारो दुहहेऊ , दुक्खफलो दुस्सहदुक्खसरूवो य । न चयंति तं पि जीवा , अइबद्धा नेहनिअलेहिं ॥७८ ।। : अर्थ : जो दुःख का कारण है , दुःख का फल है और जो अत्यन्त दुःसह ऐसे दुखोंवाला है , ऐसे संसार को , स्नेह की साँकल से बँधे हुए जीव छोड़ते…

77. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

77. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

कुणसि ममत्तं धण सयण विहद पमुहेसुष्णंत दुक्खेसु । सिढिलेसि आयरं पुण , अणंत सुक्खंमि मुक्खंमि ॥७ ७॥ : अर्थ : अनंत दु : ख के कारणरुप धन , स्वजन और वैभव आदि में तू ममता करता है और अनन्त सुखस्वरुप मोक्ष में अपने आदरभाव को शिथिल करता है ।। 77…

76. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

76. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

मा मा जंपह बहुअं , जे बद्धा चिक्कणेहिं कम्मेहिं । सव्वेसिं तेसिं जायइ , हियोवएसी महादोसो ॥७६ ॥ : अर्थ : गाढ़ कर्मों से जो बंधे हुए हैं , उन्हें ज्यादा उपदेश न दें , क्योंकि उनको दिया गया हितोपदेश महाद्वेष में ही परिणत होता है ।।76 ॥

75. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

75. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

तिहुयण जणं मरंतं , दट्ठण नयंति जे न अप्पाणं । विरमंति न पावाओ , धिद्धि धिद्वत्तणं ताणं ॥७५ ॥ : अर्थ : तीनों भुवन में जीवों को मरते हुए देखकर भी जो व्यक्ति अपनी आत्मा को धर्ममार्ग में जोड़ता नहीं है और पाप से रुकता नहीं है , वास्तव में…

74. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

74. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

डहरा वुड्ढा य पासह , गब्भत्था वि चयंति माणवा । सेणे जह वट्टयं हरे , एवं आउखयंमि तुट्टइ ॥ ७४ ॥ : अर्थ : देखो ! बाल , वृद्ध और गर्भ में रहे मनुष्य भी मृत्यु पा जाते हैं । जिस प्रकार बाज पक्षी तीतर पक्षी का हरण कर लेता…

73. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

73. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

संबुज्झह किं न बुज्झह ? संबोहि खलु पेच्च दुल्लहा । नो हु उवणमंति राइओ , नो सुलहं पुणरवि जीवियं ॥७३ ॥ : अर्थ : तुम बोध पाओ ! तुम्हें बोध क्यों नहीं होता है ? वास्तव में परलोक में बोधि की प्राप्ति होना दुर्लभ है । जिस प्रकार बीते हुए…

72. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

72. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक

कुसग्गे जह ओसबिंदुए थोवं चिट्ठइ लंबमाणए । एवं मणुआण जीविअं , समयं गोयम ! मा पमायए ॥७२ ॥ : अर्थ : घास के अग्र भाग पर रहा जलबिंदु अल्पकाल के लिए रहता है , उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी अल्पकाल के लिए है । अतः हे गौतम ! तू…

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