प्रभु दर्शन की शास्त्रीय विधि | Prabhu Darshan ki Shashtriya Vidhi

प्रभु दर्शन की शास्त्रीय विधि | Prabhu  Darshan ki Shashtriya Vidhi

प्रभु दर्शन की शास्त्रीय विधि | Prabhu Darshan ki Shashtriya Vidhi

प्रभु दर्शन की शास्त्रीय विधि

ज्ञान वडु संसार में ज्ञान परम सुख हेत
ज्ञान विना जग जीवडा न लहे तत्त्व संकेत ।

प्रभु दर्शन का शुद्ध पूर्णफल प्राप्त करने के लिए क्या करना
और क्या नहीं करना, वह आप जानते हो ?

प्रभु दर्शन करने जाये तब दूसरा सांसारिक काम साथ में नहीं ले
जाना चाहिए । (दूध के लिये तथा सब्जी के लिये थैला साथ में नहीं लेना|
प्रभु के मंदिर के शिखर के दर्शन हो, तब सिर पर हाथ जोड़कर के नमो जिणाणं कहो ।

मन्दिर में प्रवेश करते समय खाने पीने की कोई भी चीज जेब
में नहीं रखनी (दवा की गोली भी नहीं) मुंह झूठा हो तो पानी से साफ करके ही प्रवेश करें।

उर्ध्व गति प्राप्त करानेवाली परमात्मा की आज्ञा सिर पर (आज्ञाचक्र
उपर) चढाता हूँ। ऐसे भाव के साथ भाईओं को दीपक की शिखा या
बादाम आकार का  और बहनों को समर्पण भाव के प्रतीक समान 
सौभाग्य सूचकगोल (०) तिलक करना कि जिससे संसार की ममता
से शून्य बनकर ज्ञानानंद की संपूर्णता प्राप्त हो ।

धूप स्वद्रव्य से लाया हुआ हो तो श्रेष्ठ अगर वहां का लेना हो
तो विवेक रखना । पहले से धूपदानी में धूप चालु ही हो तो उससे ही
धूप करना, नहीं हो तो एक (दो, तीन नहीं) धूप फिर से लेकर धूप
करना (चरबी वाली या लकड़ी वाली अगरबत्ती नहीं वापरना)

धूप और दीप-पूजा गरारे के बाहर रह करके करना, भगवान के
एकदम पास में या नासिक के पास में धूपदानी को ले जाना अविधि
है। धूप और दीप या आरती नासिका से उपर या नाभि से नीचे नहीं
ले जाना चाहिए। धूप भगवान की बायीं ओर (अपनी दांयी) रखो तथा
दीपक भगवान की दायीं ओर (अपनी बांयी) रखना चाहिए ।

संसार नृत्य से मुक्त होने के लिये चामर वींझते हुए नृत्यपूजा
करना चाहिए । बाद में दर्पण में प्रभु का मुंह देखकर पंखा डालना,
जिससे मिथ्यात्व दुर्गंध दूर होकर परमात्मा रुप आत्मस्वरुप के दर्शन होते हैं।

निशी का अर्थ क्या ? और कौन से भाव से बोलना, वह याद रखना ।

निसीही यानि संसार के समस्त पाप-विचारों-व्यापारों का त्याग करता हूँ। 
पहले मुख्य द्वार पर निसीही बोलकर प्रवेश करना, द्वार की चौखट
में दो शेर जैसे जलग्राह के मुह हैं । इन दोनों को राग-द्वेष के प्रतीक
मानकर मैं राग द्वेष पर पांव रख करके अन्दर जाता हूँ, इसलिये “कैसे
भी सहयोग आवे तो भी मंदिर में राग द्वेष नहीं करू” ऐसी उत्तम
भावना करना चाहिए । (इन दोनों के बीच में जो कलाकार है, वहा
हाथ से स्पर्श करके सिर पर चढ़ा सकते हैं) अहंकार से शून्य बनकर
संपूर्ण समर्पण का भाव लाना ।

प्रभु दर्शन होने के साथ ही पुरुष सिर पर और महिलाएं मुह के
आगे अंजलि बद्ध प्रणाम करके “नमो जिणाणं” बोलें ।

अंत में, प्रभु दर्शन तथा पूजन से हुए हर्ष को व्यक्त करने के
लिए दूसरे किसी को अन्तराय नहीं हो वैसे धीरे से “घंटा” बजाना।
प्रभु जी को पीठ नहीं होते जैसे उल्टे पांव से चलकर मन्दिर से
बाहर निकलना। न्हावण जल देना ।
मंदिर के बाहर बैठकर आंखें बांधकर तीन नवकार का स्मरण
करके हृदय में भक्ति-भावों को स्थिर करना।

पू.साधु-साध्वी जी म. उपाश्रय में विराजमान हो तो वहां जाकर
गुरुवंदन करके उनके “श्रीमुख” से वापस पच्चक्खाण ग्रहण करना ।
आज हुए सुकृत के आनन्द के साथ में और प्रभु विरह के दुःख के
साथ में गृह तरफ प्रयाण करना।

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